पाठ्यक्रम: GS2/ स्वास्थ्य
संदर्भ
- भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु के पारिस्थितिकी विज्ञान केंद्र (CES) तथा डेनमार्क के तकनीकी विश्वविद्यालय (DTU) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसे सर्पविषरोधी प्रतिविष का विकास किया है, जिसका उपयोग भारत में पाई जाने वाली विभिन्न कोबरा प्रजातियों के सर्पदंश के उपचार में किया जा सकता है।
सर्पदंश विषाक्तता
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने सर्पदंश से उत्पन्न विषाक्तता को उच्च प्राथमिकता वाले उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों की श्रेणी में रखा है।
- विश्वभर में प्रतिवर्ष अनुमानतः 18 लाख से 27 लाख लोग सर्पदंश के कारण विषाक्तता से प्रभावित होते हैं।
- भारत में सर्पदंश: भारत में प्रतिवर्ष लगभग 30–40 लाख सर्पदंश की घटनाएँ होती हैं, जिनके कारण लगभग 50,000 लोगों की मृत्यु हो जाती है। यह संख्या विश्वभर में सर्पदंश से होने वाली कुल मृत्युओं का लगभग आधा है।
- भारत में लगभग 90% सर्पदंश की घटनाएँ चार प्रमुख विषैले सर्पों के कारण होती हैं। इनमें सामान्य करैत, भारतीय नाग (कोबरा), रसेल वाइपर तथा फुरसेदार वाइपर शामिल हैं।
- अधिक प्रभावित राज्यों में बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान तथा गुजरात शामिल हैं।
- भारत ने वर्ष 2024 में सर्पदंश विषाक्तता की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना (NAP-SE) प्रारंभ की। इसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक सर्पदंश से होने वाली मौतों में 50% की कमी लाना है।
सर्पविषरोधी प्रतिविष
- सर्पविषरोधी प्रतिविष: ये सर्पविष अथवा उसके विषैले घटकों के विरुद्ध कार्य करने वाले शुद्ध प्रतिरक्षी प्रोटीन होते हैं। इनका निर्माण ऐसे पशुओं से प्राप्त प्रतिरक्षियों की सहायता से किया जाता है, जिनकी प्रतिरक्षा प्रणाली को सर्पविष के संपर्क में लाया जाता है।
- इन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन की आवश्यक औषधियों की सूची में शामिल किया गया है।
- प्रतिविष निर्माण की प्रक्रिया: जीवनरक्षक प्रतिविष तैयार करने के लिए वैज्ञानिक विशेष पशुपालन केंद्रों में पाले जाने वाले घोड़ों की सहायता लेते हैं।
- घोड़ों को सर्पविष की अत्यंत कम एवं नियंत्रित मात्रा दी जाती है, जिससे उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली विषैले घटकों को निष्क्रिय करने वाले प्रतिरक्षी प्रोटीन उत्पन्न करती है।
- इसके बाद इन प्रतिरक्षियों को एकत्रित एवं शुद्ध किया जाता है तथा सर्पदंश से प्रभावित व्यक्तियों के उपचार में उपयोग किया जाता है।
इरुलर समुदाय
- इरुलर एक द्रविड़ जातीय समुदाय है, जो मुख्यतः तमिलनाडु, कर्नाटक तथा केरल में निवास करता है।
- तमिलनाडु में इसे विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- इरुलर समुदाय के लोग सर्प पकड़ने में कुशल होते हैं तथा नियंत्रित परिस्थितियों में साँपों से सुरक्षित रूप से विष निकाल सकते हैं। इस कारण भारत में जीवनरक्षक सर्पविषरोधी प्रतिविष के उत्पादन में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
सर्पविषरोधी प्रतिविष की उपलब्धता में चुनौतियाँ
- भौगोलिक बाधाएँ: दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित स्वास्थ्य केंद्रों में प्रायः प्रतिविष की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होती, जिससे सर्पदंश के कारण होने वाली मृत्युओं में वृद्धि होती है।
- विष के सीमित प्रकारों के विरुद्ध प्रभावशीलता: भारत में उपलब्ध प्रतिविष मुख्यतः चार प्रमुख विषैले सर्पों—नाग, करैत, रसेल वाइपर तथा फुरसेदार वाइपर—के विष के विरुद्ध तैयार किए जाते हैं।
- किंग कोबरा तथा पिट वाइपर जैसी अन्य विषैली प्रजातियों के विरुद्ध इनकी प्रभावशीलता सीमित हो सकती है, जिससे उपचार अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाता।
- सांस्कृतिक एवं सामाजिक कारक: अंधविश्वासों तथा पारंपरिक उपचार पद्धतियों में व्यापक विश्वास के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में समय पर चिकित्सकीय सहायता प्राप्त करने में विलंब होता है।
नवविकसित प्रतिविष का महत्त्व
- कम मात्रा में प्रभावशीलता: सावधानीपूर्वक चयनित एवं अभियांत्रिकीय रूप से विकसित प्रतिरक्षी कम मात्रा में ही सर्पविष को निष्क्रिय कर सकते हैं। इससे उपचार की लागत कम करने तथा अधिक मात्रा में प्रतिरक्षी देने से जुड़ी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को घटाने में सहायता मिल सकती है।
- व्यापक सुरक्षा: यह दृष्टिकोण विभिन्न सर्प प्रजातियों तथा अलग-अलग क्षेत्रों में पाए जाने वाले विष की संरचना के अनुरूप प्रतिविष विकसित करने में सहायक हो सकता है।
- बेहतर उपचार: पुनःसंयोजक प्रतिविष पारंपरिक प्रतिविषों की तुलना में अधिक लक्षित एवं प्रभावी उपचार विकल्प प्रदान कर सकते हैं।
स्रोत: IE
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संक्षिप्त समाचार 26-10-2026